मानसी अपने बगीचे की देखरेख करने वाले माली को उसके बेटे के लिए एक छोटा स्वेटर, मोज़े और कुछ गर्म कपड़े देने लगी। तभी उसकी माँ ने उसे आवाज़ दी,
“मानसी, ज़रा यहाँ तो आ!”
माली को रुकने को कहकर मानसी अंदर गई। माँ ने उसे समझाते हुए कहा,
“बेटी, संक्रांति तो चार दिन बाद है। फिर तुम अभी उसे गर्म कपड़े क्यों दे रही हो? उस दिन दान करोगी तो अधिक पुण्य मिलेगा।”
मानसी ने बहुत शांत और स्नेहभरे स्वर में उत्तर दिया,
“नहीं माँ… माली का बेटा ठंड के कारण दो दिनों से स्कूल नहीं जा पा रहा है। उसे इन कपड़ों की ज़रूरत अभी है। वैसे भी माँ, दान का कोई निश्चित समय नहीं होता। ज़रूरत के समय की गई मदद ही सच्चा दान होती है। अगर मैं ये कपड़े अभी दे दूँगी तो उसका बेटा ठंड से बच जाएगा और स्कूल भी जा सकेगा।”
मानसी की बात सुनकर माँ कुछ देर सोचती रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा,
“अच्छी बात है बेटी, और क्या हो सकता है।”
यह कहकर वे रसोई में गईं और तिल के लड्डुओं में से कुछ लड्डू निकालकर माली को देने चल पड़ीं। तभी उन्हें कुछ याद आया। उन्होंने अपनी बहू को फोन किया और कहा,
“स्टोर रूम में रखे तीनों कंबल निकाल लो और घर के नौकर, माली और काम करने वाली को दे दो।”
बहू ने आश्चर्य से पूछा,
“लेकिन माँ, आपने तो उन्हें संक्रांति के दिन बाँटने के लिए रखा था।”
माँ मुस्कराते हुए बोलीं,
“हाँ, लेकिन उन लोगों को कंबलों की ज़रूरत अभी है।”
यह कहते समय उनके चेहरे पर आत्मसंतोष और शांति साफ झलक रही थी।
इस कहानी से हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि दान और मदद का असली महत्व किसी तिथि, पर्व या परंपरा से नहीं, बल्कि समय पर की गई करुणा और संवेदनशीलता से होता है। जब किसी व्यक्ति को किसी वस्तु या सहयोग की वास्तविक आवश्यकता हो, उसी क्षण की गई सहायता सबसे बड़ा पुण्य बन जाती है। आवश्यकता के समय सहायता न मिलने पर किया गया दान केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। सच्चा मानव वही है जो दूसरों के दुःख को समझे, उनके दर्द को महसूस करे और बिना किसी स्वार्थ के तुरंत सहायता के लिए आगे बढ़े। समय पर की गई मदद ही मानवता का सबसे सुंदर रूप है !
——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
