चिड़ियाघर में अपने तीन वर्ष के बच्चे के साथ एक ग्राम्य, सादगीभरी नवयुवती घूम रही थी। वह बच्चे को कभी गोद में लेकर, तो कभी उसकी उँगली थामे, विभिन्न जानवर दिखा रही थी।
पास ही खड़े पाँच-सात आवारा कॉलेज के लड़के उस साधारण परंतु सुंदर युवती को देखकर फब्तियाँ कस रहे थे और उसका पीछा कर रहे थे।
वे फिल्मी गीत गा-गा कर जोर-जोर से ठहाका लगाते हुए उसे चिढ़ा रहे थे, किंतु युवती ने उनकी बातों पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और अपने बच्चे के आनंद में मग्न रही।
जब वह शेर के बाड़े के पास पहुँची, तभी उनमें से एक लड़का अतिउत्साह में ग्रिल पर चढ़ गया और अनियंत्रित होकर बाड़े के भीतर गिर पड़ा।
शेर धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई; उसके साथी भयभीत होकर केवल चिल्ला रहे थे। तभी उस ग्रामीण युवती ने बिना किसी हिचक के अपनी साड़ी उतारकर बाड़े में लटका दी।
गिरा हुआ लड़का साड़ी को मजबूती से पकड़कर ऊपर चढ़ आया और लोगों की सहायता से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
गार्ड ने सहमे हुए युवक से कहा—“पहले तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म दिया था, आज इस युवती ने तुम्हें दुबारा जन्म दिया है।”
केवल ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी वह अर्धवस्त्रा युवती उन सबको उसी क्षण माँ-सी प्रतीत होने लगी; जिन आँखों में उपहास था, वहाँ अब लज्जा और कृतज्ञता थी। यही क्षण था—हृदय परिवर्तन का।
*इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है* कि स्त्री का सम्मान करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है; उसका उपहास नहीं, आदर होना चाहिए। साहस, करुणा और मानवीयता किसी भी बाहरी रूप या गाँव-शहर के भेद पर निर्भर नहीं होती। दूसरों की अस्मिता का अपमान करने वाले क्षणभर में ही परिस्थितियों के सामने असहाय हो सकते हैं, जबकि जिसे वे तुच्छ समझते हैं वही संकट में उनके प्राणों की रक्षक बन सकती है। अतः हमें अपने आचरण में शालीनता, संवेदनशीलता और स्त्री-सम्मान को सदैव प्रथम स्थान देना चाहिए—यही सच्चा हृदय परिवर्तन है !
——— राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
