” दिव्य मिलन “

यह कथा भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन की महिमा को प्रकट करती है। यह केवल पति-पत्नी के प्रेम की कहानी नहीं, बल्कि तप, धैर्य, समर्पण और सत्य की विजय की कथा भी है।

एक बार पर्वतराज हिमालय के गृह में पार्वती का जन्म हुआ। पूर्वजन्म में वे सती थीं, जिन्होंने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए थे। सती का प्रेम शिव से अविच्छिन्न था, इसलिए वे जन्मों के पार फिर से शिव को पाने आई थीं। बचपन से ही पार्वती के हृदय में शिव के प्रति अगाध भक्ति थी। वे फूल तोड़ते समय, आरती करते समय और खेलते समय भी शिव का नाम जपती रहतीं। हिमालय व मेनका उनकी भक्ति देखकर चकित थे।

उधर शिव कैलाश पर समाधिस्थ थे – वीतराग, संसार से विरक्त, पर करुणामय। देवताओं पर अत्याचार बढ़ने लगे, तारकासुर जैसे दैत्य अभिमान में चूर थे। देवताओं को वरदान मिला था कि उनका वध केवल शिव-पुत्र ही कर सकता है। पर शिव तो योग में लीन थे, गृहस्थी से दूर। तब देवताओं ने पार्वती से प्रार्थना की कि वे शिव का हृदय जीतें और संसार का कल्याण करें।

पार्वती ने संकल्प लिया – “मैं शिव को तप से ही प्राप्त करूँगी।” घने वन में जाकर कठोर तपस्या आरंभ हुई। धूप-वर्षा, सर्दी-गर्मी, सभी कष्टों को सहते हुए वे केवल शिव के ध्यान में लीन रहीं। पहले उन्होंने पत्तों पर निर्वाह किया, फिर केवल जल पर, और अंत में निष्प्राण-सी होकर केवल नाम-स्मरण पर। उनकी तपस्या से त्रिलोक कम्पित हो उठा।

कामदेव को देवताओं ने शिव का तप भंग करने भेजा। उसने वसंत की मधुर बयार बहाई, पुष्पवृष्टि की, मनोहर संगीत गूँजा – और उसने अपना बाण छोड़ दिया। किंतु शिव की आँखें खुलीं तो उनका तीसरा नेत्र प्रज्वलित हो उठा। कामदेव भस्म हो गया। पर यही घटना पार्वती के अटूट संकल्प की परीक्षा बन गई। शिव ने जाना कि जिसने इस विकट परिस्थितियों में भी तप नहीं छोड़ा, उसका प्रेम केवल सांसारिक नहीं हो सकता।

शिव ने ब्राह्मण वेश धारण कर पार्वती की परीक्षा ली। वे बोले – “शिव औघड़ हैं, भस्म रमण करते हैं, गले में सर्प धारण करते हैं, ऐसे तपस्वी से विवाह क्यों?” पार्वती मुस्कुराईं और उत्तर दिया – “मेरे लिए शिव ही सत्य हैं। वे भले संसार को कठिन प्रतीत हों, पर वे करुणा और ज्ञान के सागर हैं। मैं उन्हें ही पति रूप में स्वीकार करती हूँ।” शिव का हृदय प्रसन्न हो उठा। उन्होंने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और वरदान दिया – “तुम ही शाश्वत शक्ति हो, तुम बिना मैं शून्य हूँ।”

हिमालय में उत्सव का वातावरण छा गया। देव-ऋषि, गंधर्व, अप्सराएँ सभी एकत्र हुए। भव्य विवाह हुआ – शिव-शक्ति का मिलन, तप और प्रेम का संगम। आगे चलकर उन्हीं के गृह से स्कंद और गणेश का अवतार हुआ, और शिव-पार्वती लोककल्याण के पथप्रदर्शक बने।

यह कथा सिखाती है कि सच्चा प्रेम अधिकार से नहीं, तप-त्याग और धैर्य से प्राप्त होता है। जब दृढ़ निश्चय, संयम और समर्पण साथ हों, तब स्वयं दिव्यता भी मार्ग खोल देती है। शिव-पार्वती का मिलन हमें बताता है कि शिव बिना शक्ति अधूरे हैं और शक्ति बिना शिव – इसलिए जीवन में संतुलन, श्रद्धा और प्रेम ही परम सत्य है।

—— राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

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