रमेश एक साधारण परिवार का लड़का था। उसने हमेशा यही सपना देखा था कि एक दिन अच्छी नौकरी पाएगा, अपने माता-पिता का सिर गर्व से ऊँचा करेगा। उसने पढ़ाई में कोई कमी नहीं छोड़ी—सुबह की नींद, शाम की सैर, त्योहारों की खुशियाँ—सब उसने अपनी किताबों के नाम कर दीं। परीक्षाओं की तैयारी करते-करते रात के दो-दो बजे तक जागना उसके लिए आम बात थी।
लेकिन किस्मत ने जैसे उससे मुँह मोड़ लिया था। बार-बार दी गई परीक्षाएँ, इंटरव्यू, रिजल्ट—हर जगह असफलता ही मिली। एक दिन वह चुपचाप अपनी किताबों के सामने बैठा रहा। पन्ने खुले थे, पर आँखों में शब्द नहीं, आँसू तैर रहे थे। वह टूट चुका था।
उसके मन में आया—“इतनी मेहनत किस काम की? शायद मैं इसी लायक नहीं…”
धीरे-धीरे उससे पढ़ाई भी न हुई और न ही मन मजदूरी में लगा। शरीर थकता नहीं था, पर मन हार चुका था।
उसी समय उसके गाँव के बुज़ुर्ग शिक्षक शरण बाबू उसे मिले। उन्होंने रमेश की आँखों का सूखापन पढ़ लिया और बोले—
“क्या बात है बेटा, आज तुम्हारी आँखों में चमक नहीं, सवाल हैं।”
रमेश फूट पड़ा—
“गुरुजी, मैंने पूरी कोशिश कर ली। अब मुझसे नहीं होता। नौकरी भी नहीं मिली, पढ़ाई से भी मन हट गया है। शायद मेरी मेहनत बेकार गई।”
शरण बाबू मुस्कुराए और बोले—
“बताओ रमेश, नदी कितनी बार पत्थर से टकराती है?”
रमेश बोला—“अनगिनत बार।”
“और टूटता कौन है?” शरण बाबू ने पूछा—“पत्थर या पानी?”
रमेश चुप रहा।
गुरुजी बोले—
“पत्थर टूटता है, पानी नहीं। क्योंकि पानी की खासियत जीत नहीं, लगातार बहना है। असफलता तुम्हें तोड़ी नहीं, बस तुम्हें रोक कर खड़ा कर दिया है। चलना फिर से तुम्हें ही होगा।”
उस रात रमेश ने पहली बार अपनी असफलता को दुश्मन नहीं, शिक्षक माना। उसने सोचा—नौकरी नहीं मिली, इसका मतलब मैं खत्म नहीं, बल्कि अभी अधूरा हूँ। अगले ही दिन उसने फिर से समय बाँधा, नोट्स सहेजे, पुरानी गलतियाँ ढूंढीं। साथ ही उसने पास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। उसे एहसास हुआ कि ज्ञान सिर्फ परीक्षा के लिए नहीं, जीवन के लिए भी होता है।
धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास लौटने लगा। अब वह हर असफल कोशिश को अपने अनुभव का नया पन्ना मानने लगा। महीनों बाद जब फिर से परीक्षा आई, वह काँपा नहीं—मुस्कुराया।
इस बार उसका लक्ष्य सिर्फ नौकरी नहीं था—खुद से हारना नहीं था।
और एक दिन परिणाम आया—रमेश का चयन हो चुका था। उसकी आँखों में आँसू थे, पर अब वह हार के नहीं, विजय के थे। उसने अपने मन से कहा—
“नौकरी मेरी मंज़िल नहीं थी, हिम्मत को जीतना ही पहला मकसद था।”
असफलता रास्ता रोक सकती है, इंसान को नहीं।
जो व्यक्ति गिरकर बैठ जाता है, वही हारता है।
जो गिरकर दोबारा उठता है—उसी का नाम विजेता होता है।
——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
