पचास वर्ष की आयु पार कर चुके एक सज्जन गहरे अवसाद से ग्रस्त थे। बाहर से देखने पर उनका जीवन सफल लगता था—अच्छी नौकरी, परिवार, घर और कार—पर भीतर ही भीतर वे चिंता, तनाव और असंतोष की आग में जल रहे थे।
बच्चों की पढ़ाई और भविष्य, नौकरी का दबाव, घर और कार का ऋण, बढ़ती जिम्मेदारियाँ—इन सबने उनके मन को इस कदर जकड़ लिया था कि उन्हें लगने लगा था मानो उनके जीवन में कुछ भी शेष नहीं बचा। पत्नी ने उनकी बिगड़ती मानसिक स्थिति को समझते हुए एक काउंसलर से मिलने का समय लिया, जो ज्योतिषी भी था। कुंडली देखने पर सब कुछ सामान्य निकला, तब काउंसलर ने असली उपचार आरंभ किया।
पत्नी को बाहर बैठने को कहकर उसने सज्जन से मन की परतें खोलने को कहा। सज्जन बोलते चले गए—अपनी असफलताओं, भय, अपेक्षाओं और थकान की पूरी कथा सुना दी। तभी काउंसलर ने एक अजीब-सा प्रश्न किया—“आप तीसरी कक्षा में किस विद्यालय में पढ़ते थे?” सज्जन चकित हुए, पर विद्यालय का नाम बता दिया।
काउंसलर ने आदेश दिया कि वे उसी विद्यालय से अपनी तीसरी कक्षा के सभी रजिस्टर लेकर आएँ और अपने सहपाठियों के वर्तमान जीवन की जानकारी जुटाएँ। विवश होकर सज्जन स्कूल गए, चार रजिस्टर लाए जिनमें लगभग दो सौ नाम थे, और अगले एक महीने तक दिन-रात घूमकर जानकारी एकत्र करते रहे।
जब वे लौटे तो रजिस्टर मानो जीवन की कठोर सच्चाइयों का दस्तावेज बन चुके थे—बीस प्रतिशत सहपाठी इस संसार में नहीं रहे थे, कई महिलाएँ विधवा या तलाकशुदा थीं, कुछ नशे की गिरफ्त में थे, कुछ का कोई पता ही नहीं था, कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे, कुछ गरीबी में जीवन काट रहे थे, तो कुछ अपंगता के कारण बिस्तर से उठने में असमर्थ थे, किसी का बच्चा विक्षिप्त था, कोई जेल में था, और कुछ आज भी जीवन में भटक रहे थे।
यह सब देखकर सज्जन की आँखें खुल गईं। काउंसलर ने शांत स्वर में पूछा—“अब बताइए, आपका अवसाद कैसा है?” सज्जन निःशब्द हो गए। उन्हें पहली बार समझ आया कि वे न तो भूखे हैं, न बीमार, न अकेले, न असहाय।
उनका परिवार सुरक्षित है, वे स्वयं स्वस्थ हैं और कानून, अस्पताल या जेल से उनका कोई वास्ता नहीं। उसी क्षण उन्होंने स्वीकार किया कि जीवन में कठिनाइयाँ होते हुए भी वे वास्तव में भाग्यशाली हैं, और कृतज्ञता ही सबसे बड़ा उपचार है।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अवसाद अक्सर परिस्थितियों से नहीं, बल्कि तुलना और असंतोष से जन्म लेता है। जब हम दूसरों के दुःखों को समझते हैं, तो अपने जीवन की वास्तविक समृद्धि का बोध होता है। जीवन में धीरूभाई अंबानी बनना आवश्यक नहीं, पर स्वस्थ रहना, परिवार का साथ होना और स्वतंत्र जीवन जीना ही सबसे बड़ा सौभाग्य है। कृतज्ञता अपनाएँ, क्योंकि वही अवसाद की सबसे सशक्त औषधि है।
——- राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !
