” निष्कपट प्रेम की सच्ची भक्ति “

बरसाने के शांत वन में संध्या उतर रही थी, आकाश के रंग धीरे-धीरे केसरिया से नीले में ढल रहे थे, मंद पवन के साथ गोकुल की ओर से आती बाँसुरी की एक क्षीण-सी धुन वातावरण को भक्तिमय बना रही थी, उसी वन में राधा जी एक शिला पर बैठी थीं, दृष्टि किसी एक दिशा में स्थिर थी, मानो आँखें नहीं बल्कि उनका हृदय देख रहा हो।

सखियों ने कई बार उन्हें पुकारा, पर राधा जैसे किसी और ही लोक में थीं, अंततः एक सखी ने कोमल स्वर में पूछा—“राधे, तुम रोज़ उसी दिशा में क्यों निहारती रहती हो?”

राधा ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया—“क्योंकि वहाँ से अब स्वर नहीं, स्मृति आती है, और स्मृति में कृष्ण स्वयं उतर आते हैं, हर बाँसुरी के स्वर के साथ उनके चरणों की धूल मेरे हृदय में बस जाती है।” सखी ने सरल भाव से कहा—“पर आज तो श्याम आए ही नहीं।” यह सुनकर राधा ने आँखें मूँद लीं, उनके चेहरे पर अद्भुत शांति फैल गई और वे बोलीं—“जब प्रेम शुद्ध हो जाता है, तब मिलन के लिए देह की आवश्यकता नहीं रहती, भाव ही सब कुछ हो जाता है, मैं जिस भाव में उन्हें स्मरण करती हूँ, वे उसी भाव में प्रकट हो जाते हैं—कभी हवा की छुअन बनकर, कभी धूप की किरण बनकर, कभी मन की कंपन बनकर और कभी इस गहन मौन में।”

उसी क्षण पवन ने एक पुष्प को हौले से उड़ाया और वह सीधे राधा के चरणों में आकर ठहर गया, सखियाँ विस्मय से एक-दूसरे को देखने लगीं, पर राधा न झुकीं, न चकित हुईं, वे बस मुस्कुरा उठीं और बोलीं—“देखो सखियों, आज कृष्ण ने शब्दों की नहीं, मौन की आरती भेजी है।”

उस क्षण सखियों को अनुभव हुआ कि भक्ति केवल मंदिरों में घण्टे बजाने से नहीं होती, प्रेम केवल मिलन में नहीं बसता और ईश्वर केवल साकार रूप में नहीं आते।

राधा का प्रेम किसी अपेक्षा से बंधा नहीं था, उसमें शिकायत नहीं, अधिकार नहीं, बस समर्पण था, और वही समर्पण कृष्ण को हर पल उनके पास ले आता था, राधा के लिए कृष्ण कोई दूर बसे देव नहीं थे, वे उनकी हर साँस, हर अनुभूति, हर मौन में बसे थे।

इस कथा की शिक्षा यही है कि जब हृदय निष्कपट प्रेम और सच्ची भक्ति से भर जाता है, तब भगवान को बुलाने के लिए शब्दों, कर्मकाण्डों या दिखावे की आवश्यकता नहीं रहती, वे स्वयं हमारे जीवन में उतर आते हैं—कभी किसी घटना के रूप में, कभी किसी अनुभूति के रूप में और कभी उस मौन शांति के रूप में जो भीतर से हमें पूर्ण कर देती है, ठीक वैसे ही जैसे राधा के हृदय में कृष्ण सदा विद्यमान रहे; सच्ची भक्ति वही है जहाँ अपेक्षा नहीं, और सच्चा प्रेम वही है जहाँ दूरी भी मिलन बन  जाए  !

——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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