” ज़िंदगी “

कॉलेज के दिनों का एक व्हाट्सऐप ग्रुप, जो सालों से बस “हाय-हैलो” तक सीमित रह गया था, अचानक फिर से सक्रिय हुआ। वजह थी—पुराने दोस्तों की एक मुलाक़ात।

कई साल बाद जब सब मिले, तो किसी की बड़ी कंपनी में पैकेज करोड़ों में था, कोई विदेश में बस गया था, तो कोई बिज़नेस में शानदार तरक्की कर चुका था। सब बाहरी चमक-दमक में सफल दिख रहे थे, पर चेहरे पर पहले वाली निश्चिंत मुस्कान कहीं खो गई थी। तय हुआ कि अपने सबसे फेवरेट प्रोफेसर से मिलकर ही इस मीट-अप को पूरा किया जाए।

सभी उत्साहित थे, क्योंकि वही प्रोफेसर थे जिन्होंने कॉलेज में उन्हें सिर्फ विषय ही नहीं, ज़िंदगी के मायने भी सिखाए थे। जब सब उनके घर पहुँचे तो प्रोफेसर साहब बड़ी आत्मीय मुस्कान के साथ मिले।

वे हर एक से हाल-चाल पूछते रहे—कौन कहाँ है, क्या कर रहा है, किस मुकाम तक पहुँचा है। धीरे-धीरे बातचीत का विषय पैसे, पोज़ीशन और काम के बढ़ते दबाव तक पहुँच गया। सबकी परेशानी एक ही थी—“जीवन में मज़ा नहीं बचा, स्ट्रेस बहुत है… खुशियाँ जैसे कहीं पीछे छूट गई हैं।”
प्रोफेसर साहब इतने समय तक शांत बैठकर सुनते रहे। फिर वे एकदम उठे और बोले, “रुको, मैं अभी आया।” कुछ ही मिनट में वे किचन से ट्रे में रखी हुई गर्मागर्म कॉफ़ी लेकर लौटे और बोले, “स्टूडेंट्स, कॉफ़ी तो मैं बना लाया हूँ, पर कृपया आप सब एक-एक कप किचन से लेकर आ जाइए।”
सभी दोस्त किचन में गए तो वहाँ तरह-तरह के कप रखे थे—महँगे क्रिस्टल वाले, चमकदार पोर्सिलेन कप, साधारण स्टील कप और कुछ सादे ग्लास वाले कप।

जैसे ही मौका मिला, सबने अपने-अपने लिए सबसे अच्छा और सबसे महँगा दिखने वाला कप उठा लिया। किसी ने चमकदार कप चुना, किसी ने महँगे डिज़ाइन वाला, जबकि साधारण कप लगभग आख़िर में ही उठे।
जब सब अपने चुने हुए कप में कॉफ़ी लेकर बैठ गए तो प्रोफेसर साहब मुस्कुराए और बोले, “देखा आपने? आप सबने सबसे अच्छे कप चुन लिए, और साधारण कप वहीँ रह गए। जबकि कप का कॉफ़ी की क्वालिटी से कोई लेना-देना नहीं। कप सिर्फ एक माध्यम है… पर आपने कप को महत्व दिया, कॉफ़ी को नहीं।”
सभी चुप होकर सुनने लगे। प्रोफेसर साहब ने आगे कहा—
“बिल्कुल इसी तरह हमारी ज़िंदगी कॉफ़ी है और नौकरी, पैसा, पोज़ीशन… ये सब कप हैं। हम असल में ज़िंदगी का स्वाद चाहते हैं, पर पूरी ज़िंदगी उन कपों को सुंदर बनाने में लगा देते हैं—कौन सी कार लेनी है, कौन सा फ़ोन रखना है, कौन सा घर… और फिर दूसरों के कप देखकर हीनभावना में भी आ जाते हैं। जबकि सच यही है कि कप से कॉफ़ी का मज़ा न बढ़ता है न घटता है।”
कमरे में अचानक एक शांति फैल गई। सबके चेहरे ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने भीतर दबा सच खोलकर रख दिया हो।
प्रोफेसर साहब ने अंत में बस इतना कहा—
“खुश लोग वो नहीं जिनके पास सबसे अच्छे कप होते हैं… बल्कि वो होते हैं जिन्हें कॉफ़ी पीना आता है। जो अपनी ज़िंदगी में जो मिला है, उसे एंजॉय करते हैं, उसके लिए शुक्रगुज़ार रहते हैं और साधनों को साधन ही मानते हैं—जीवन नहीं।”
दोस्तों को लगा जैसे सालों पुराना कोई बोझ हल्का हो गया। बाहर से सफल दिखते हुए भी भीतर खोई हुई जो खुशी थी, उसकी दिशा जैसे फिर मिल गई।
वे सभी मुस्कुराए… सच में, कप की नहीं, कॉफ़ी की चिंता करनी चाहिए।
जीवन को सरल रखो, सादगी से जियो और हर घूँट को भरपूर जीओ—क्योंकि असली स्वाद इसी में है।

——- राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

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