श्यामपुरा का राजा अपनी न्यायप्रियता और प्रजा-सेवा के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध था; वह अक्सर गुप्त वेश में राज्य-भ्रमण करता, ताकि बिना किसी दिखावे के अपनी प्रजा की वास्तविक स्थिति जान सके। एक दिन ऐसे ही घूमते हुए वह झुंझुनूं शहर के बाहर पहुँचा, जहाँ उसने मार्ग के किनारे एक दुबला-पतला, झुर्रियों से भरा वृद्ध मंगलाराम को देखा, जो अपनी कमजोर उँगलियों से मिट्टी कुरेदकर एक नन्हा-सा पौधा रोप रहा था। तेज धूप में भी वह वृद्ध बड़ी तन्मयता से काम कर रहा था, मानो उसके सामने कोई महान उद्देश्य हो। राजा को कौतूहल हुआ—इतनी उम्र, इतना परिश्रम, और इतना छोटा पौधा? वह आगे बढ़ा और वृद्ध के पास जाकर बोला, “दादा, यह आप किस पौधे को लगा रहे हैं?”
वृद्ध ने मुस्कुराकर कहा, “आम का पौधा है बाबूजी।” राजा ने मन ही मन हिसाब लगाया—आम का पेड़ बड़ा होने में ही कई साल, और फल आने में उससे भी ज्यादा समय… वृद्ध की कमर झुकी हुई थी, हाथ काँपते थे—स्पष्ट था कि वह आदमी इतनी लंबी उम्र शायद ना जी पाए। राजा के माथे पर जिज्ञासा की लकीरें उभर आईं।
उसने नरम स्वर में, पर आश्चर्य छिपाए बिना पूछा, “दादा, जब इस पेड़ पर फल आएँगे, तब तक क्या आप जीवित रह पाएँगे?” वृद्ध ने मिट्टी समतल करते हुए राजा की ओर देखा—उसकी आँखों में उम्र का धैर्य और जीवन का सारा अनुभव समाया था। उसने बहुत शांत भाव से कहा, “महाराज—ओह, बाबूजी, आप सोच रहे हैं कि मैं ऐसा काम क्यों कर रहा हूँ जिसका फल शायद मैं कभी चख भी न सकूँ?
पर जरा सोचिए… क्या मेरी पूरी जिंदगी उन्हीं पेड़ों की छाँव में नहीं बीती, जिन्हें मैंने नहीं लगाया? कितने ही फलों का स्वाद मैंने चखा है, जो किसी और की मेहनत से उगे थे। अगर सभी लोग यह सोच लेते कि ‘हमें क्या मिलेगा’, तो आज दुनिया में एक भी पेड़ नहीं होता, न एक भी छाँव, न कोई मीठा फल।”
राजा के कदम अनायास रुक गए; वृद्ध की आवाज़ में न कठोरता थी, न शिकायत—सिर्फ एक सच्चाई थी, जो भीतर तक उतर गई। वृद्ध आगे बोला, “हर मनुष्य पर समाज का ऋण होता है—हम पैदा होते ही उस छाँव में आते हैं, जो किसी और ने बनाई होती है।
अब जब मेरी बारी है, तो क्या मैं भी अगली पीढ़ी के लिए कुछ नहीं छोड़ूँ? पेड़ मेरे काम आएँ या न आएँ, पर मेरे बाद आने वाले बच्चों को जरूर आएँगे। इस धरती पर जीना सिर्फ लेना नहीं, देना भी है। जो सिर्फ अपने लाभ के लिए काम करे, वह मनुष्य नहीं—स्वार्थ का बंधक है।”
राजा का हृदय जैसे किसी प्रकाश से भर गया। उसे लगा कि राजसिंहासन पर बैठकर जितना ज्ञान नहीं मिला, उससे अधिक यह बूढ़ा माली उसे सड़क किनारे सिखा रहा है। वृद्ध की आँखों में अब कोई असहायता नहीं थी—वह एक शिक्षक की तरह शांत, दृढ़ और उदार दिख रहा था। राजा ने उस छोटे-से पौधे की ओर देखा—वह साधारण सा था, पर उसमें भविष्य की अनगिनत छायाएँ, अनगिनत फलों की मधुरता और अनगिनत लोगों की खुशियाँ छिपी थीं। वह जान गया कि असली महानता वही है जो अपने जीवन से आगे सोच सके। उसी क्षण राजा ने मन ही मन प्रण लिया कि वह राज्य में ऐसे पेड़ लगवाएगा जिनका लाभ उससे आगे की कई पीढ़ियाँ उठाएँगी।
वह वृद्ध को प्रणाम कर धीरे से बोला, “दादा, आज आपने मेरे मन की आँखें खोल दीं नवनीत।” वृद्ध मुस्कुरा दिया—शायद वह मुस्कान ही उसकी सबसे बड़ी कमाई थी। उस दिन राजा लौटा तो वही था, पर भीतर से एक नया मनुष्य बन चुका था। उसने जाना कि दुनिया उन्हीं के कारण सुंदर है जो अपनी खुशियों से आगे बढ़कर दूसरों की खुशियों के लिए बीज बोते हैं—चाहे वे बीज आम के हों, उम्मीद के हों, या मानवता के।
*कहानी से सीख — “पेड़ सिर्फ फल देने के लिए नहीं उगते, वे इंसान को इंसान बनाने के लिए भी उगते हैं।”
जो पेड़ आज हमें छाँव देते हैं, वे किसी और की मेहनत का उपहार हैं; इसलिए हमारा भी कर्तव्य है कि हम भविष्य के लिए कुछ ऐसा छोड़ें, जो आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी आसान और मधुर बना दे।
—— राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

