” अपने सिंहासन से उतरकर “

अपने  सिंहासन  से

तुम  आ  गए  उतरकर

मेरे  एकाकी  घर  के  दरवाजे  पर

नाथ  ,  खड़े  हो  गए  ठिठककर    !

 

बैठे  अकेला  मन  ही  मन

गाता  था  मैं  गान

तुम्हारे  कानों  तक  पहुंचा  वह  सुर

तुम  आ  गए  उतरकर

मेरे  एकाकी  घर  के  दरवाजे  पर

नाथ  ,  खड़े  हो  गए  ठिठककर    !!

 

तुम्हारी  सभा  में   कितने  ही  गुणी

कितने ही  हैं  गान

मिला  तुम्हारा  प्रेम  ,  तभी  गा  सका  आज

यह  गुण हीन भी  गान   !!

 

विश्व— तान  के  बीच  उठा  यह

एक  करुण  सुर  !

लेकर  हाथों  में  वर  माला

तुम आ  गए  उतरकर

मेरे  एकाकी  घर  के  दरवाजे  पर

नाथ  खड़े  हो  गए   ठिठककर   !!

——-  प्रसिद्ध कवि  रवींद्रनाथ  टैगोर

( संकलित  )

 

——  राम  कुमार  दीक्षित  ,   पत्रकार   !

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