छोड़ो मेहंदी, खड्ग संभालो
ख़ुद ही अपना चीर बचा लो
द्युत बिछाये बैठे शकुनि ,
मस्तक सब बिक जायेंगे
सुनो द्रोपदी, शस्त्र उठा लो , अब गोविंद न आयेंगे !
कब तक आस लगाओगी तुम, बिके हुये अखबारों से
कैसी रक्षा मांग रही हो दुःशासन दरबारों से
स्वयं जो लज्जाहीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे
सुनो द्रोपदी , शस्त्र उठा लो , अब गोविंद न आयेंगे !
कल तक केवल अंधा राजा, अब गूंगा– बहरा भी है
होंठ सिल दिये हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है
तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे , –
किसको क्या समझायेंगे ?
सुनो द्रोपदी , शस्त्र उठा लो , अब गोविंद न आयेंगे !
——– पुष्य मित्र उपाध्याय
( संकलित )
——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

