श्रीनारायण चतुर्वेदी, रामधारी सिंह ’दिनकर’, रामकुमार वर्मा, रामचन्द्र शुक्ल, श्याम नारायण पाण्डेय एवं कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह स्मृति समारोह सम्पन्न

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लखनऊ: 09 अक्टूबर, 2025

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा श्रीनारायण चतुर्वेदी, रामधारी सिंह ’दिनकर’, रामकुमार वर्मा, रामचन्द्र शुक्ल, श्याम नारायण पाण्डेय एवं कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह स्मृति समारोहके शुभ अवसर पर दिन गुरुवार09 अक्टूबर, 2025 को एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दी भवन के निराला सभागार लखनऊ में पूर्वाह्न 10.30 बजे से किया गया।
दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, पुष्पार्पण के उपरान्त वाणी वंदना सुश्री श्वेता जायसवालद्वारा प्रस्तुत की गयी।
सम्माननीय अतिथि-डॉ0 विद्याविन्दु सिंह, श्री पद्मकांत शर्मा ’प्रभात’, डॉ0 राहुल पाण्डेय, डॉ0 सूर्यप्रसाद दीक्षित, डॉ0 रामकठिन सिंह एवं श्री शशि प्रकाश सिंहका स्वागत उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर डॉ0 अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा किया गया।
पद्मश्री डॉ0 विद्याविन्दु सिंहने भइया साहब श्रीनारायण चतुर्वेदी के सम्बन्ध में अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि यह प्रसिद्ध था कि जो भी उनके दरबार में जाता है, वह साहित्यकार बन जाता है। उन्हें ’विकट’ भी कहा जाता था, लेकिन उनके निकट वात्सल्य भी था तेज, ओज भी था।
श्री पद्मकांत शर्मा ’प्रभात’ने कहा-रामधारी सिंह ’दिनकर’ ने अंग्रेज शासन की क्रूरता पर कविताएँ लिखीं फलतः सरकारी नौकरी छोड़नी पड़ी। छायावाद का प्रभाव उनकी श्रृंगारिक रचनाओं में देखने को मिलता है। राष्ट्रवाद की चेतना उनकीरचनाओं में मुखर हुई। दिनकर जी राजसभा के सदस्य के रूपमें पहुँचे। दिनकर के गद्य का प्रदेय भी महत्वपूर्ण है। वे ओजमयी काव्य धारा के कवि हैं।
डॉ0 राहुल पाण्डेयने कहा-डॉ0 रामकुमार वर्मा का व्यक्तित्व मयूरपंखी है। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में निरन्तर लेखन किया। वे श्रेष्ठ कवि, नाटककार, एकांकीकार, साहित्य के इतिहास लेखक, आलोचक के रूप में स्मरण किये जाते हैं। भारतीय संस्कृति, राष्ट्र के प्रति प्रेम उनके संस्कारों में था। इसीलिए उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों के चरित्रों का अध्ययन कर उन्हें अपनी रचनाओं का केन्द्र बनाया। छायावाद, प्रयोगवाद एवं प्रगतिवाद की त्रयी उनकी कविताओं में देखने को मिलती है। उन्होंने उत्तरायण, अहिल्या और एकलव्य के माध्यम से नवीन उद्भावनाओं के साथ काव्य सृजन किया। वे परम्परा से जुड़ते अवश्य है, लेकिन सृजनात्मकता के साथ वे अपने साहित्य को नये आयाम देते हैं।
डॉ0 सूर्यप्रसाद दीक्षित ने कहा-आचार्य शुक्ल बहुत बड़े समीक्षक, गणमान्य शिक्षक, समीक्षक, इतिहासकार थे। यह विलक्षण संयोग उनके व्यक्तित्व में दिखायी देता है। कवि और समीक्षक का द्वन्द्व बहुत पुराना है। रामचन्द्र शुक्ल ने दोनों के बीच सेतु स्थापित करने का प्रयास किया। शुक्ल जी की निबन्ध शैली अपने में अद्भुत है। चिंतामणि उनके प्रौढ़ लेखन का प्रस्थान बिन्दु है।
डॉ0 रामकठिन सिंह ने कहा-मेरा सौभाग्य है कि मैं उस स्थान पर पैदा हुआ। जहाँ श्याम नारायण पाण्डेय जी का जन्म हुआ था। वे जन्मजात कवि थे। उनका पहला खण्डकाव्य ’त्रेता के दो वीर’ जो बाद में ’तुमुल’ नाम से प्रकाशित हुआ। उनका अन्तिम काव्य परशुराम था। उनकी 17 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले और बाद भी वीर रस में कविताएँ लिखीं। उन्होंने समय के अनुकूल कविताएँ लिखीं। उन्होंने ऐसे आदर्श युवाओं के सामने रखे, जिसमें प्रेरणा लेकर संघर्ष किया जा सके।
श्री शशि प्रकाश सिंह ने कहा-मेरे पिता का बहुत सा साहित्य उपलब्ध नहीं था, परन्तु साहित्यानुरागियों के सहयोग और प्रेरणा से उनका साहित्य गं्रथावली के रूप में प्रकाशित हो गया है। उनका सारा जीवन वैष्णव संस्कार में रहा। उन्होंने अंग्रेजी में भी साहित्य लिखा। उन्होंने हिन्दी के प्रचार एवं विकास के लिए निरन्तर कार्य किया। उन्होंने विदेशों में भी कार्य किया।
इस अवसर पर डॉ0 रामकुमार वर्मा की काव्यकृति उत्तरायण से अंश का पाठ निर्मला देवी, रामधारी सिंह ’दिनकर’ की ’प्रणभंग’ का अंश तनु मिश्रा ने प्रस्तुत किये। पं0 श्रीनारायण चतुर्वेदी के चन्द्रबली पांडे के संस्मरण को प्रस्तुत किया सुकीर्ति तिवारी ने। इसी क्रम में श्यामनारायण पांडेय की काव्य कृति जौहर व रामचन्द्र शुक्ल जी के निबन्ध करुणा के कुछ अंश का पाठ किया गया। कुँवर चन्द्र प्रकाश की कविता ’रामदूत’ के अंश का पाठ सुशील कुमार ने किया।
डॉ0 अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उ0प्र0 हिन्दी संस्थानद्वारा कार्यक्रम का संचालन एवं संगोष्ठी में उपस्थित समस्त साहित्यकारों, विद्वत्तजनों एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया गया।

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