धीरे चलो, धीरे बंधु लिए चलो धीरे !
मन्दिर में, अपने विजन में,
पास में प्रकाश नहीं, पथ मुझको ज्ञात नहीं,
छाई है कालिमा घनेरी !!
चरणों की उठती ध्वनि आती बस तेरी ,
रात है अंधेरी !!
हवा सौंप जाती है वसनों की वह सुगंधि,
तेरी बस तेरी !!
उसी ओर आऊँ मैं तनिक से इशारे पर,
करूँ नहीं देरी !!
—– प्रसिद्ध कवि रवींद्रनाथ टैगोर
( संकलित )
—- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
