” दूसरों के घर में खुशियाँ बाँटिये “

एक नगर में तीन मित्र रहते थे। तीनों के जीवन में सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन एक व्यक्ति की कही गई बातों ने कई परिवारों की खुशियाँ छीन लीं। वह व्यक्ति बिना सोचे-समझे दूसरों के निजी जीवन में प्रश्न उठाता और उनके मन में संदेह के बीज बो देता था।

पहली घटना — एक छोटी-सी बात और टूटा परिवार

एक दिन एक महिला अपनी सहेली से मिलने गई। उसकी सहेली ने कुछ दिन पहले ही एक बच्चे को जन्म दिया था। बातचीत के दौरान उसने पूछा, “बहन, माँ बनने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या उपहार दिया?”

सहेली ने मुस्कुराते हुए कहा, “कुछ नहीं, लेकिन वे मेरा और बच्चे का बहुत ध्यान रखते हैं। मेरे लिए यही सबसे बड़ा उपहार है।”

यह सुनकर दूसरी महिला बोली, “बस इतना ही? तुम्हारे पति को तुम्हारी कोई कद्र नहीं है। दूसरी महिलाओं के पति तो अपनी पत्नियों को कितने महँगे उपहार देते हैं।”

यह बात सुनकर नई माँ के मन में संदेह पैदा हो गया। शाम को जब उसका पति घर आया, तो उसने उपहार न देने की शिकायत शुरू कर दी। बात बढ़ते-बढ़ते झगड़े में बदल गई। दोनों ने एक-दूसरे को अपशब्द कहे और उनके रिश्ते में इतनी कड़वाहट भर गई कि कुछ समय बाद वे अलग हो गए।

जिस बात को पति-पत्नी आपसी समझ से सुलझा सकते थे, उसमें एक बाहरी व्यक्ति की टिप्पणी ने आग में घी डालने का काम किया।

दूसरी घटना — नौकरी से हाथ धो बैठा युवक

एक दिन रवि ने अपने मित्र पवन से पूछा, “तुम्हें महीने में कितनी तनख्वाह मिलती है?”

पवन ने उत्तर दिया, “अठारह हजार रुपये।”

रवि हँसकर बोला, “इतने कम पैसों में तुम्हारा गुजारा कैसे होता है? तुम्हारा मालिक तो तुम्हारा शोषण कर रहा है।”

पहले पवन अपनी नौकरी से संतुष्ट था। उसकी आवश्यकताएँ पूरी हो रही थीं और घर में शांति थी। लेकिन रवि की बात उसके मन में बैठ गई। अगले दिन उसने मालिक से अधिक वेतन माँगा। मालिक ने असमर्थता जताई, तो पवन ने नाराज होकर नौकरी छोड़ दी। नई नौकरी मिलने में कई महीने लग गए और उसका परिवार आर्थिक परेशानी में पड़ गया।

रवि ने तो केवल एक टिप्पणी की थी, लेकिन उसके शब्दों ने पवन के जीवन को कठिन बना दिया।

तीसरी घटना — पिता के मन में संदेह

एक बुजुर्ग पिता का बेटा दूसरे शहर में रहता था। काम और परिवार की जिम्मेदारियों के कारण वह कभी-कभी ही अपने पिता से मिलने आ पाता था। पिता उसकी परिस्थितियों को समझते थे और बेटे से प्रेम करते थे।

एक दिन पड़ोसी ने कहा, “जिस पिता ने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, अब वही बेटा तुम्हारे लिए समय नहीं निकाल सकता? लगता है, उसे तुम्हारी कोई परवाह नहीं है।”

यह सुनकर पिता के मन में संदेह पैदा हो गया। अब जब भी बेटा मिलने आता, पिता उसके प्रेम पर प्रश्न उठाने लगते। धीरे-धीरे उनके संबंधों में दूरी बढ़ने लगी।

 

मित्रों, शब्द छोटे होते हैं, लेकिन उनका प्रभाव बहुत गहरा हो सकता है। हमारी एक गलत टिप्पणी किसी के मन में संदेह, ईर्ष्या और नफरत पैदा कर सकती है। इसलिए किसी के रिश्ते, नौकरी, परिवार या आर्थिक स्थिति पर बिना पूरी बात जाने टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

दूसरों के घरों में अंधे बनकर जाइए और गूँगे बनकर लौटिए। अर्थात दूसरों के निजी जीवन में कमियाँ खोजने के बजाय उनकी खुशियों का सम्मान कीजिए और उनके दुख में समझदारी से साथ दीजिए।

याद रखिए, अच्छे इंसान वे नहीं जो दूसरों के जीवन में समस्याएँ खोजते हैं, बल्कि वे हैं जो समस्याओं के समय सहारा बनते हैं।

आपकी वाणी किसी टूटते रिश्ते को बचा भी सकती है और किसी हँसते-खेलते परिवार को उजाड़ भी सकती है। इसलिए बोलने से पहले सोचिए, क्योंकि हर सच बोलना आवश्यक नहीं और हर प्रश्न पूछना उचित नहीं होता।

दूसरों के घरों में खुशियाँ बाँटिए, संदेह नहीं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार    !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *