एक गाँव में दो भाई रहते थे। दोनों के बीच गहरा प्रेम, विश्वास और आत्मीयता थी। बड़ा भाई जब भी बाजार से कोई वस्तु लाता, तो छोटे भाई और उसके परिवार के लिए भी अवश्य कुछ न कुछ लेकर आता। छोटा भाई भी बड़े भाई का अत्यंत सम्मान करता था। पूरे गाँव में दोनों भाइयों के प्रेम की मिसाल दी जाती थी।
लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी एक छोटी-सी बात भी बड़े रिश्तों में दरार डाल देती है।
एक दिन किसी साधारण-सी बात पर दोनों भाइयों के बीच विवाद हो गया। बात बढ़ती चली गई और क्रोध में आकर छोटे भाई ने बड़े भाई से कुछ ऐसे कटु शब्द कह दिए, जिन्होंने उसके हृदय को गहराई तक आहत कर दिया। उस दिन के बाद दोनों ने एक-दूसरे से बोलना बंद कर दिया। वर्षों तक वे अलग-अलग रहे। यदि कभी रास्ते में आमना-सामना हो जाता, तो दोनों नज़रें चुराकर निकल जाते।
समय बीतता गया। एक दिन छोटे भाई की बेटी का विवाह निश्चित हुआ। विवाह की तैयारियाँ शुरू हुईं, लेकिन उसके मन में एक टीस बनी रही कि इतने बड़े शुभ अवसर पर यदि बड़ा भाई साथ न हो, तो यह खुशी अधूरी रह जाएगी।
आख़िर उसने अपना अहंकार त्याग दिया और बड़े भाई के घर पहुँच गया। उसने उनके चरण पकड़ लिए और नम्रता से कहा, “भैया, मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई थी। मुझे क्षमा कर दीजिए। मेरी बेटी का विवाह है। कृपया चलकर इस शुभ कार्य की ज़िम्मेदारी संभालिए।”
किन्तु वर्षों से मन में बैठी कटु स्मृतियाँ बड़े भाई को पिघला न सकीं। उन्होंने विवाह में आने से साफ़ इंकार कर दिया। छोटा भाई निराश होकर लौट आया।
गाँव के लोगों ने उसे बताया कि बड़े भाई प्रतिदिन एक संत के सत्संग में जाते हैं और उनकी बातों का बहुत सम्मान करते हैं। यह सुनकर छोटा भाई संत के पास पहुँचा। उसने पूरी घटना सुनाई, अपनी गलती स्वीकार की और संत से विनती की कि किसी प्रकार उसके भाई को समझाकर विवाह में आने के लिए तैयार कर दें।
अगले दिन जब बड़ा भाई सत्संग में पहुँचा, तो संत ने मुस्कुराकर पूछा, “सुना है तुम्हारे छोटे भाई की बेटी का विवाह है। तुम कौन-कौन से कार्य संभाल रहे हो?”
बड़े भाई ने शांत स्वर में कहा, “गुरुदेव, मैं उस विवाह में नहीं जाऊँगा। कई वर्ष पहले उसने मुझे ऐसे कटु वचन कहे थे, जिन्हें मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ।”
संत ने कुछ नहीं कहा और सत्संग समाप्त होने के बाद उन्हें अपने पास बुलाया।
उन्होंने पूछा, “पिछले रविवार मैंने जो प्रवचन दिया था, उसका विषय तुम्हें याद है?”
बड़ा भाई सोचने लगा, पर उसे कुछ भी याद नहीं आया। उसने बहुत प्रयास किया, फिर भी उत्तर न दे सका।
तब संत ने गंभीर स्वर में कहा, “आश्चर्य की बात है! आठ दिन पहले सुनाई गई अच्छी बातें तुम्हें याद नहीं रहीं, लेकिन वर्षों पहले बोले गए कटु शब्द आज भी तुम्हारे मन में काँटे की तरह चुभ रहे हैं। यदि तुम अच्छी शिक्षाओं को स्मरण नहीं रख सकते और बुरी स्मृतियों को छोड़ नहीं सकते, तो सत्संग का लाभ कैसे मिलेगा? केवल सुनना पर्याप्त नहीं, उसे जीवन में उतारना भी आवश्यक है।”
संत के ये वचन बड़े भाई के हृदय में उतर गए। उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने आत्मचिंतन किया और समझ गए कि सच्चा बड़प्पन क्षमा करने और पुरानी कटु बातों को भुला देने में ही है।
वे तुरंत छोटे भाई के घर पहुँचे। छोटे भाई ने उन्हें देखा तो उसकी आँखें भर आईं। दोनों भाई एक-दूसरे के गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़े। वर्षों की दूरियाँ एक पल में समाप्त हो गईं। बड़े भाई ने पूरे मन से विवाह की सभी ज़िम्मेदारियाँ निभाईं और परिवार में फिर से प्रेम, विश्वास और अपनापन लौट आया।
जीवन में सुखी रहना है तो अच्छी बातों को स्मरण रखें और बुरी यादों को समय रहते भुला दें। क्षमा करना कमजोरी नहीं, बल्कि महानता का सबसे सुंदर स्वरूप है। जो व्यक्ति मन से कटु स्मृतियों का बोझ उतार देता है, वही सच्चे अर्थों में शांत, प्रसन्न और सफल जीवन जीता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
