” तिनकों का घोंसला “

जून की वह गुनगुनी सुबह आम दिनों जैसी नहीं थी। आज फादर्स डे था। शहर के बड़े-बड़े विज्ञापनों और सोशल मीडिया पर पिताओं के सम्मान में संदेश तैर रहे थे। लेकिन शहर से दूर, राजस्थान के राजसमंद जिले के एक छोटे से गाँव में रहने वाले बूढ़े रामजी लाल के लिए यह दिन रोज़ जैसा ही था। सुबह उठकर पौधों को पानी देना, घर की टूटी मुंडेर को निहारना और अपने बेटे आकाश की राह देखना ही उनकी दिनचर्या थी।

रामजी लाल जीवन भर एक साधारण सरकारी स्कूल में मामूली चपरासी रहे थे। उनके पास न तो बड़ी धन-दौलत थी और न ही समाज में कोई बड़ा पद। लेकिन उनके पास एक अमूल्य धरोहर थी—उनका आत्मसम्मान, ईमानदारी और अपने बच्चों के लिए असीम त्याग। उनका मूक संघर्ष और निस्वार्थ भावना ही उनके परिवार का असली रक्षक थी।

जब आकाश छोटा था, तो स्कूल की फीस समय पर जमा हो, उसकी किताबें अधूरी न रहें और उसके सपनों को ऊंची उड़ान मिले, इसके लिए रामजी लाल ने न जाने कितनी रातें जागकर काटी थीं। वे अपनी इच्छाओं और सुविधाओं को हमेशा पीछे धकेल देते थे और परिवार की जरूरतों को प्राथमिकता देते थे। आकाश को याद था कि कैसे एक बार कड़कड़ाती ठंड में पिता ने अपने लिए नया स्वेटर नहीं खरीदा, बल्कि उन्हीं पैसों से आकाश के लिए परीक्षा की गाइड लाकर दी थी। वे कम बोलते थे, लेकिन हर परिस्थिति में ढाल बनकर खड़े रहते थे।

आज आकाश शहर में एक बेहद प्रतिष्ठित पद पर पहुंच चुका था। वह बड़ा आदमी बन गया था, लेकिन इस भागदौड़ भरी जिंदगी में वह भी ‘सही समय आने पर धन्यवाद कहेंगे’ वाली भूल कर बैठा था। वह अक्सर सोचता कि जब बड़ा मुकाम हासिल कर लेगा, तब पिता को एक आलीशान जिंदगी तोहफे में देगा। मगर वह यह भूल गया था कि पिताओं को आलीशान तोहफे नहीं, बल्कि बच्चों का थोड़ा सा वक्त और सम्मान चाहिए होता है।

फादर्स डे के दिन आकाश अचानक बिना बताए गाँव पहुंचा। उसने देखा कि धूप तेज हो चुकी थी और उसके वृद्ध पिता आंगन में लगे पौधों को पानी दे रहे थे, जिसके पत्ते तेज गर्मी में झुलस रहे थे। पिता के फटे हुए जूतों और ढीली पड़ चुकी कमीज को देखकर आकाश का दिल भर आया। उसे अखबार में पढ़ी वह बात याद आ गई कि *’हम उनके इस मूक संघर्ष और असीम त्याग का कर्ज कभी नहीं चुका सकते।’*

आकाश चुपके से पीछे से गया और उसने अपने पिता को कसकर गले लगा लिया। रामजी लाल चौंक गए। उन्होंने मुड़कर देखा तो बेटे की आँखों में आंसू थे।

आकाश ने रुंधे गले से कहा, “बाबूजी, मैं हमेशा सही समय का इंतजार करता रहा कि जब बहुत काबिल बन जाऊंगा तब आपको शुक्रिया कहूंगा। पर आज मैं समझ गया कि आपके दिए छोटे-छोटे त्याग कितने बड़े थे। आपने खुद को मिटाकर मुझे बनाया है। मुझे माफ कर दीजिए कि मैं कभी खुलकर आपकी कद्र नहीं कर पाया।”

रामजी लाल की पथराई आँखों में खुशी के आंसू छलक आए। उन्होंने आकाश के सिर पर हाथ फेरा और धीमी आवाज में बोले, “बेटा, पिता को कभी धन्यवाद नहीं चाहिए होता। तू बस ईमानदारी के रास्ते पर चलता रह, मेरी पूरी जिंदगी की तपस्या सफल हो जाएगी।”

यह कहानी हमें सिखाती है कि पिता का प्यार अक्सर जिम्मेदारियों के पीछे छुपा रहता है। वे अपने दुखों और संघर्षों का बखान नहीं करते, बल्कि हमें सुरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास करते हैं। जीवन में कभी भी पिता को ‘थैंक यू’ कहने के लिए किसी विशेष बड़े अवसर या सही समय का इंतजार न करें; क्योंकि वह सही समय अक्सर आता ही नहीं है। आज ही अपने पिता के पास बैठें, उन्हें गले लगाएं और बताएं कि वे आपके जीवन में क्या मायने रखते हैं।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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