संध्या का समय था। आसमान हल्के सुनहरे रंग में रंग चुका था और गांव की पगडंडी पर संत दादू दीनदयाल जी अपनी भिक्षा यात्रा पर निकले हुए थे। उनके चेहरे पर अद्भुत शांति थी, लेकिन उस रास्ते पर एक ऐसा घर पड़ता था, जहां से गुजरते ही वातावरण बदल जाता था।
उस घर में रहने वाला व्यक्ति दादू जी का कट्टर निंदक था। जैसे ही वह संत को देखता, उसके चेहरे पर तिरस्कार उभर आता—
“देखो, फिर आ गया यह बड़ा संत! बड़ा ज्ञानी बनता है…!”
वह तरह-तरह के आरोप लगाता, कठोर शब्द बोलता और फिर अंदर चला जाता।
पर आश्चर्य की बात यह थी कि दादू जी हर दिन उसी रास्ते से गुजरते। कई बार तो जब वह निंदक दिखाई नहीं देता, तब भी दादू जी उसके घर के सामने कुछ क्षण रुकते, जैसे किसी का इंतजार कर रहे हों।
एक दिन… फिर दूसरा दिन… और फिर कई दिन बीत गए। वह निंदक दिखाई नहीं दिया।
इस बार दादू जी ठिठक गए। उनके चेहरे पर चिंता की रेखाएं उभर आईं। उन्होंने आसपास के लोगों से पूछा—
“भाई, वह व्यक्ति कई दिनों से दिख नहीं रहा, सब कुशल तो है?”
एक बूढ़े ग्रामीण ने भारी आवाज में कहा—
“महाराज… उसका देहांत हो गया।”
यह सुनते ही जैसे समय ठहर गया। दादू जी के हाथ कांपने लगे, आंखों में आंसू भर आए। और फिर अचानक… वे जोर-जोर से रोने लगे।
शिष्य यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। एक शिष्य ने साहस करके पूछा—
“गुरुदेव! आप क्यों रो रहे हैं? वह तो आपकी निंदा करता था। उसके जाने पर तो आपको प्रसन्न होना चाहिए।”
दादू जी ने आंसुओं से भीगी आंखों से शिष्य की ओर देखा और धीमे स्वर में बोले—
“तुम नहीं समझे… वह मेरा सबसे बड़ा हितैषी था।”
शिष्य आश्चर्यचकित रह गया।
दादू जी बोले—
“वह जब-जब मेरी निंदा करता था, तब-तब मुझे यह याद दिलाता था कि मैं कोई महान संत नहीं हूँ। वह मेरे अंदर अहंकार को पनपने नहीं देता था। उसके शब्द मेरे मन का मैल धोते थे।”
कुछ क्षण रुककर उन्होंने गहरी सांस ली—
“अब उसके जाने के बाद… मुझे सच बताने वाला कौन रहेगा? मेरे दोष दिखाने वाला कौन होगा?”
पूरा वातावरण मौन हो गया। शिष्य की आंखें भी नम हो गईं। उसे आज समझ आया कि सच्चा संत वही होता है, जो निंदा में भी उपकार देख सके।
दादू जी ने आकाश की ओर देखते हुए कहा—
“निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी बनाय…
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।”
उस दिन शिष्य ने सीखा—
जो हमें हमारी कमियां बताता है, वह हमारा शत्रु नहीं, बल्कि सच्चा मित्र होता है।
और दादू जी…
वह उस पगडंडी से आगे बढ़ गए, लेकिन उनके आंसू यह सिखा गए कि विनम्रता ही सच्चे संत की पहचान होती है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
