” बूढ़ी दादी की आखिरी हाय “

सुबह का समय था, हल्की ठंडक हवा में घुली हुई थी और मैं रोज़ की तरह अपने काम पर जाने की तैयारी कर रहा था, तभी घर के आँगन में अचानक कुछ हलचल सी महसूस हुई, जैसे कोई अनहोनी घट गई हो। मैं जल्दी से बाहर निकला तो देखा कि हमारे पुराने परिचित मोहनलाल काका घर के आँगन में चारपाई पर सिर झुकाए बैठे थे।
उनके चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं और आँखों में थकान साफ झलक रही थी। उन्हें इस हाल में देखकर मैं चौंक गया, क्योंकि कभी उनका नाम शहर के सबसे अमीर और घमंडी लोगों में लिया जाता था। हमारे परिवार और उनके परिवार का संबंध लगभग पचास वर्षों से था।
उनका खानदानी काम सूद पर पैसा देना था और लोगों के मकान, दुकान और जेवर गिरवी रखना उनकी आदत बन चुकी थी। कुछ वर्षों पहले उन्होंने ठेकेदारी का काम भी शुरू किया था और शहर में उनका बड़ा नाम था, लेकिन आज उनकी हालत देखकर मन में कई सवाल उठने लगे।
थोड़ी देर बाद जब वे चले गए तो मैंने माँ से पूछा, “माँ, आखिर काका इतने परेशान क्यों दिख रहे थे?” माँ ने एक गहरी साँस ली और जो कहानी सुनानी शुरू की, उसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए। माँ ने बताया कि पिछले पाँच सालों में मोहनलाल काका का सब कुछ बर्बाद हो गया। शेयर बाज़ार में उन्होंने भारी पैसा लगाया, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया और करोड़ों रुपये डूब गए।
ऊपर से जो सरकारी ठेके उन्होंने पूरे किए थे, उनका भुगतान भी अटक गया। काम बचाने के लिए उन्हें बाज़ार से चालीस लाख रुपये ऊँचे ब्याज पर उधार लेने पड़े, लेकिन ब्याज इतना बढ़ता गया कि आज वही चालीस लाख सत्तर लाख बन गए। अब हालत यह थी कि उनके पास खाने तक के पैसे नहीं बचे थे और अपना आलीशान घर बेचने की नौबत आ गई थी।
मैं यह सब सुनकर पहले ही हैरान था, लेकिन माँ ने आगे जो बताया, वह और भी भयावह था। माँ बोलीं कि आज से करीब पचास साल पहले की बात है, जब एक गरीब बूढ़ी महिला गंगा दादी उनके घर आई थीं। उनके शरीर पर फटे-पुराने कपड़े थे और हाथ में एक छोटी सी पोटली थी। उन्होंने मोहनलाल काका के पिता से चालीस रुपये उधार लिए थे और बदले में अपनी चाँदी की पायल, झुमके और एक छोटी सी चैन गिरवी रख दी थी। गंगा दादी ने खून-पसीना एक करके तीन-चार साल में वह चालीस रुपये ब्याज सहित चुका दिए थे। उस समय वे बहुत खुश थीं कि अब उनके जेवर उन्हें वापस मिल जाएंगे, लेकिन लालच ने इंसानियत को हरा दिया।

मोहनलाल काका के पिता ने झूठे हिसाब-किताब बनाकर उनसे और पैसे माँगने शुरू कर दिए और उनके जेवर लौटाने से साफ मना कर दिया। गंगा दादी बार-बार उनके घर जातीं, हाथ जोड़तीं, रोतीं, गिड़गिड़ातीं, लेकिन उनका पत्थर दिल नहीं पिघला। एक दिन वह रोती-बिलखती हमारे घर आई थीं। माँ ने बताया कि उस दिन उनकी हालत देखकर हर किसी का दिल पिघल गया था।
गंगा दादी बार-बार यही कह रही थीं कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई उन जेवरों में लगा दी थी और अब उनके पास कुछ भी नहीं बचा। जब उनकी सारी विनती बेकार हो गई, तो उन्होंने आँसू भरी आँखों से आसमान की ओर देखा और काँपती आवाज़ में कहा, “मुझे अब मेरे जेवर नहीं चाहिए, पर जिसने मेरा हक छीना है, उसका सर्वनाश जरूर होगा।
मेरे चालीस रुपये उसकी नस-नस से निकलेंगे और उसका सुख चैन सब छिन जाएगा।” यह कहकर वे वहाँ से चली गईं। कुछ ही दिनों बाद यह खबर आई कि गंगा दादी इस दुनिया को छोड़कर चली गईं। माँ ने कहा कि उस दिन से उनके दिल में एक डर बैठ गया था कि किसी गरीब की हाय कभी खाली नहीं जाती।

आज वही चालीस रुपये, जो कभी धोखे से रोके गए थे, पचास साल बाद सत्तर लाख बनकर मोहनलाल काका के सामने खड़े थे। जिस ब्याज के लालच में उन्होंने एक बूढ़ी महिला के आँसू नहीं देखे, वही ब्याज आज उनकी जिंदगी पर पहाड़ बनकर टूट पड़ा था। उनका बड़ा सा घर बिकने की कगार पर था, परिवार तंगहाली में जी रहा था और कभी जिस दरवाजे पर लोगों की भीड़ लगी रहती थी, वहाँ आज सन्नाटा पसरा हुआ था।
माँ की बातें सुनकर मैं कुछ देर तक बिल्कुल शांत खड़ा रहा और मन ही मन सोचता रहा कि सच में ऊपरवाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती, पर जब चलती है तो इंसान को उसकी हर गलती का हिसाब देना पड़ता है। उस दिन मुझे यह भी समझ में आया कि किसी गरीब का हक मारना केवल एक गलत काम नहीं, बल्कि अपने ही भविष्य के लिए दुख और विनाश को न्योता देना है, क्योंकि इंसान चाहे कितना भी चालाक क्यों न बन जाए, समय और कर्म का न्याय उससे कभी नहीं हारता, और जब किसी बूढ़े, लाचार इंसान के दिल से निकली हाय लगती है, तो वर्षों बाद भी वह अपना असर जरूर दिखाती है और बड़े से बड़े महल को भी आँसुओं में बदल देती है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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