एक समय की बात है, एक राज्य में एक बुद्धिमान राजा राज करता था। उसके पास एक बकरी थी, जो देखने में साधारण थी, लेकिन उसी बकरी के कारण एक दिन पूरे राज्य में एक अनोखी घोषणा हुई।
राजा ने पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवाया—
“जो कोई इस बकरी को जंगल में चराकर पूरी तरह तृप्त कर देगा, मैं उसे अपने राज्य का आधा हिस्सा दे दूँगा। लेकिन ध्यान रहे, बकरी का पेट भरा है या नहीं, इसकी परीक्षा मैं स्वयं करूँगा।”
यह सुनते ही कई लोग उत्साहित हो उठे। आधा राज्य पाने का लालच किसे नहीं होता! अगले ही दिन एक आदमी राजा के पास पहुँचा और बोला, “महाराज, बकरी को पेट भर खिलाना कोई कठिन काम नहीं है। मैं यह काम अवश्य कर सकता हूँ।”
राजा ने उसे बकरी सौंप दी। वह आदमी बकरी को जंगल में ले गया और दिन भर उसे हरी-हरी घास खिलाता रहा। शाम तक उसने सोचा, “आज तो बकरी ने बहुत घास खा ली है, अब इसका पेट अवश्य भर गया होगा।”
वह बकरी को लेकर दरबार में पहुँचा। राजा ने बकरी के सामने थोड़ी-सी ताज़ी घास रखी। जैसे ही बकरी ने घास देखी, वह तुरंत उसे खाने लगी। यह देखकर राजा मुस्कुराए और बोले, “तुम इसे पेट भर नहीं खिला सके। यदि पेट भर गया होता, तो यह फिर घास क्यों खाती?”
ऐसा कई लोगों ने किया। वे बकरी को दिन भर खूब घास खिलाते, पर दरबार में आते ही बकरी फिर घास खाने लगती। कोई भी सफल नहीं हो पाया।
इसी बीच एक बुद्धिमान साधु ने यह घोषणा सुनी। उसने सोचा, “इसमें अवश्य कोई गहरा रहस्य छिपा है। केवल अधिक खिलाने से काम नहीं चलेगा, कुछ अलग करना होगा।”
वह राजा के पास पहुँचा और बकरी को जंगल ले गया। जब भी बकरी घास खाने के लिए आगे बढ़ती, साधु उसे हल्की-सी लकड़ी से डाँटता या मारता। पूरे दिन यही क्रम चलता रहा। धीरे-धीरे बकरी के मन में यह डर बैठ गया कि घास खाने का मतलब मार खाना है।
शाम को साधु बकरी को दरबार में ले आया और बोला, “महाराज, मैंने इसे भरपेट खिला दिया है। अब यह घास नहीं खाएगी।”
राजा ने फिर से बकरी के सामने ताज़ी घास रखी। इस बार बकरी ने घास की ओर देखा भी नहीं, बल्कि डरकर पीछे हट गई। राजा समझ गए कि साधु ने रहस्य को पहचान लिया है। उन्होंने प्रसन्न होकर उसे आधा राज्य दे दिया।
तब साधु ने सभी को समझाया—
“यह बकरी हमारे मन के समान है। मन की इच्छाएँ कभी खत्म नहीं होतीं। चाहे उसे कितना भी सुख और साधन दे दो, वह और चाहता ही रहेगा। लेकिन यदि हम अपने मन को विवेक और अनुशासन की लकड़ी से नियंत्रित करें, तो वह हमारे वश में आ सकता है।”
मन की इच्छाएँ बकरी की तरह होती हैं—उन्हें जितना खिलाओ, उतना बढ़ती हैं। यदि जीवन में शांति और संतोष चाहिए, तो मन पर विवेक, अनुशासन और संयम का अंकुश लगाना जरूरी है। जो व्यक्ति अपने मन को जीत लेता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और सुख प्राप्त करता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
