” अहंकार “

सुन्दर और घने वन उपरमालिया में एक बहुत बड़ा और मजबूत वृक्ष खड़ा था। उसकी शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हुई थीं और वह अपनी छाया से आसपास के वातावरण को शीतल बनाए रखता था। उसी वृक्ष के पास एक छोटी-सी लता उगी। शुरुआत में वह बहुत कमजोर और नाजुक थी। तेज हवा चलती तो वह काँपने लगती और कभी-कभी जमीन पर झुक जाती।

धीरे-धीरे उस लता ने वृक्ष का सहारा लेना शुरू किया। वह वृक्ष के तने से लिपटकर ऊपर की ओर बढ़ने लगी। वृक्ष ने भी उसे सहारा दिया, जिससे लता सुरक्षित रहती और ऊँचाई की ओर बढ़ती जाती। समय बीतता गया और कुछ ही महीनों में वह छोटी-सी लता बड़ी होकर वृक्ष के बराबर ऊँचाई तक पहुँच गई। अब उस पर सुंदर-सुंदर फूल खिलने लगे, जिनकी सुगंध दूर-दूर तक फैलने लगी।

वन में आने-जाने वाले लोग उस वृक्ष और लता को देखकर बहुत प्रसन्न होते। वे कहते कि इस वृक्ष पर लिपटी यह सुंदर लता इसे और भी आकर्षक बना देती है। यह सब देखकर वृक्ष के मन में धीरे-धीरे अहंकार आ गया। वह सोचने लगा कि यदि उसने लता को सहारा न दिया होता, तो लता कभी इतनी ऊँची नहीं हो पाती। उसे लगा कि लता का अस्तित्व केवल उसी के कारण है।

एक दिन वृक्ष ने अहंकार में भरकर लता से कठोर स्वर में कहा, “सुनो! तुम जो कुछ भी हो, मेरी वजह से हो। इसलिए चुपचाप मेरी बात मानो, वरना मैं तुम्हें अपने से अलग कर दूँगा और तुम जमीन पर गिर जाओगी।” लता यह सुनकर चुप हो गई, क्योंकि वह विनम्र स्वभाव की थी।

उसी समय उस रास्ते से दो पथिक गुजर रहे थे। उन्होंने उस वृक्ष और उस पर लिपटी सुंदर लता को देखा तो वहीं रुक गए। एक पथिक ने अपने साथी से कहा, “भाई, यह वृक्ष कितना सुंदर लग रहा है! लेकिन सच कहूँ तो इस पर जो सुंदर लता फूलों से लदी हुई है, उसी के कारण यह वृक्ष और भी आकर्षक दिख रहा है। इसकी छाया और सुंदरता को देखकर मेरा मन कर रहा है कि हम कुछ देर इसके नीचे बैठकर विश्राम करें।”

वृक्ष ने जब यह बात सुनी तो उसे बहुत लज्जा आई। उसे एहसास हुआ कि उसकी सुंदरता और महत्त्व केवल उसके अकेले होने में नहीं, बल्कि लता के साथ होने में है। यदि लता न होती, तो शायद लोग उसे इतना सुंदर और आकर्षक नहीं मानते। उस क्षण वृक्ष का अहंकार समाप्त हो गया और उसने मन ही मन लता से क्षमा माँगी।

तब से वृक्ष और लता दोनों प्रेम और सहयोग से साथ-साथ रहने लगे। वे समझ गए कि एक-दूसरे का सहारा बनने से ही जीवन में उन्नति और सुंदरता आती है।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि साथ मिलकर रहने से ही सभी की प्रगति होती है। मनुष्य को कभी भी अपने ऊपर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि सफलता में अक्सर दूसरों का भी योगदान होता है। विनम्रता और सहयोग ही जीवन को सुंदर और सफल बनाते हैं।

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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