एक समय की बात है, जब भारतवर्ष के प्राचीन काल में, पवित्र नदियों और घने वनों से घिरे एक आश्रम में एक महान शिल्पकार ऋषि रहते थे, जिनका नाम शिल्पाचार्य ऋषि वर्धन था। कहा जाता था कि उन्हें स्वयं भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त था, इसलिए उनके हाथों से निकली पत्थर की मूर्तियाँ इतनी सजीव लगती थीं मानो उनमें प्राण बस गए हों। दूर-दूर के राज्योँ से राजा, साधु और शिष्य उनके पास आकर शिल्पकला सीखते थे।
उन्हीं शिष्यों में एक युवक अर्जुनक भी था, जो कई वर्षों से गुरु के साथ रहकर साधना और शिल्प का अभ्यास कर रहा था, परंतु उसके मन में अक्सर अधीरता और असंतोष भरा रहता था। वह सोचता कि इतने वर्षों की मेहनत के बाद भी उसकी बनाई मूर्तियाँ साधारण क्यों दिखती हैं, जबकि गुरु के स्पर्श मात्र से पत्थर दिव्य रूप धारण कर लेता है। एक दिन उसने साहस करके गुरु से पूछा, “गुरुदेव, क्या मेरे भाग्य में कभी ऐसी कला नहीं है? मैं भी दिन-रात परिश्रम करता हूँ, फिर भी मेरी मूर्तियाँ जीवंत क्यों नहीं बनतीं?” ऋषि वर्धन मुस्कुराए, उनकी आँखों में करुणा और ज्ञान की चमक थी।
उन्होंने आश्रम के पास रखे एक विशाल शिला-खंड की ओर संकेत करते हुए कहा, “वत्स, आज तुम इस पत्थर को तराशो और इसमें छिपे रूप को बाहर लाने का प्रयास करो।” शिष्य ने पूरे उत्साह से हथौड़ा और छेनी उठाई और दिनभर परिश्रम करता रहा। वह बार-बार जोर से प्रहार करता, जल्दी-जल्दी आकार देने का प्रयास करता, परंतु पत्थर केवल टूटता रहा, उसमें कोई सुंदरता प्रकट नहीं हुई। सूर्यास्त तक वह थककर निराश हो गया और गुरु के चरणों में बैठ गया। अगले दिन प्रातःकाल, जब आश्रम में वेद-मंत्रों की ध्वनि गूँज रही थी और यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित थी, तब गुरु वर्धन उसी पत्थर के पास पहुँचे। उन्होंने पहले शांत मन से उस शिला को ध्यानपूर्वक देखा, मानो उसकी अंतरात्मा को पढ़ रहे हों। फिर उन्होंने अत्यंत संयम और धैर्य से कुछ ही सटीक प्रहार किए। आश्चर्य की बात यह थी कि थोड़ी ही देर में उसी पत्थर से एक दिव्य मूर्ति का स्वरूप उभरने लगा—वह मूर्ति थी भगवान विष्णु की, जिनका शांत और सौम्य स्वरूप देखकर अर्जुनक की आँखें आश्चर्य से फैल गईं।
उसने विनम्रता से पूछा, “गुरुदेव, आपने तो केवल कुछ ही प्रहार किए और पत्थर दिव्य बन गया, जबकि मैंने पूरे दिन मेहनत की थी, फिर भी कुछ न बना सका!” गुरु ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “वत्स, यह केवल प्रहारों की संख्या का परिणाम नहीं, बल्कि दृष्टि और धैर्य का फल है। जब तुम पत्थर पर प्रहार कर रहे थे, तब तुम्हारे मन में जल्दबाजी और अधीरता थी, परंतु जब मैं प्रहार करता हूँ, तब पहले उस पत्थर के भीतर छिपे देवता को अपने मन में देख लेता हूँ। मैं पत्थर को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसमें छिपे दिव्य स्वरूप को प्रकट करने के लिए प्रहार करता हूँ।
यही रहस्य मुझे स्वयं भगवान विश्वकर्मा की आराधना से प्राप्त हुआ है।” यह सुनकर अर्जुनक का हृदय बदल गया। उसने समझ लिया कि केवल परिश्रम ही पर्याप्त नहीं, बल्कि साधना, सही दृष्टिकोण और धैर्य भी उतने ही आवश्यक हैं। उस दिन से उसने हर कार्य को पूजा मानकर, मन को शांत रखकर और हर प्रहार को सोच-समझकर करना शुरू किया। वर्षों की निरंतर साधना के बाद उसकी कला में भी दिव्यता आ गई, और एक दिन वह भी अपने गुरु की तरह महान शिल्पकार बना, जिसकी मूर्तियाँ मंदिरों में स्थापित होने लगीं और लोग उन्हें देखकर श्रद्धा से नतमस्तक होने लगे।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में सफलता पाने के लिए केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि धैर्य, सही दृष्टि और ईश्वर में विश्वास भी उतना ही आवश्यक है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
