शहर के बीचों-बीच बने एक बड़े मैदान में हर साल की तरह इस बार भी होलिका दहन की तैयारियाँ चल रही थीं। रंग-बिरंगी झालरों से सजा पंडाल, ढोल-नगाड़ों की आवाज़ और बच्चों की खिलखिलाहट माहौल को उत्सवमय बना रही थी।
उसी कॉलोनी में रहने वाला आरव, जो कॉलेज का छात्र था, चुपचाप एक कोने में खड़ा सब देख रहा था। उसके मन में उत्साह कम और चिंता ज्यादा थी। पिछले कुछ महीनों से वह सोशल मीडिया की दुनिया में इतना उलझ गया था कि पढ़ाई, परिवार और अपने असली दोस्तों से दूर होता जा रहा था। लाइक्स और फॉलोअर्स की होड़ ने उसके मन में तुलना, ईर्ष्या और तनाव भर दिया था।
उसकी दादी पास आकर बोलीं, “क्या सोच रहे हो बेटा?”
आरव बोला, “दादी, लोग कहते हैं कि होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत है, लेकिन आज के समय में बुराई कहाँ है? चारों तरफ तो दिखावा और प्रतिस्पर्धा ही है।”
दादी मुस्कुराईं और बोलीं, “बुराई बाहर कम, अंदर ज्यादा होती है। जैसे अहंकार, जलन, लालच और झूठ। होलिका दहन हमें यही सिखाता है कि अपने अंदर की बुराइयों को जलाओ।”
उनकी बात आरव के दिल को छू गई। उसे याद आया कि कैसे उसने एक दोस्त की सफलता से जलकर उसके बारे में गलत बातें फैला दी थीं। उसे पछतावा होने लगा।
शाम ढली, सब लोग होलिका के चारों ओर इकट्ठा हुए। पूजा शुरू हुई। पंडित जी ने कहा, “आज हम अपनी बुरी आदतों को इस अग्नि में समर्पित करें।”
आरव ने मन ही मन सोचा — “मैं अपने अंदर की ईर्ष्या, झूठ और दिखावे की भावना को आज यहीं खत्म कर दूंगा।”
होलिका में आग लगाई गई। लपटें आसमान छूने लगीं। सभी “होली है!” के जयकारे लगा रहे थे। आग की रोशनी में आरव का चेहरा भी चमक रहा था, जैसे उसके मन का अंधेरा दूर हो रहा हो।
अगले दिन रंगों की होली थी। आरव सुबह-सुबह अपने दोस्त के घर गया और माफी मांग ली। दोस्त ने उसे गले लगा लिया। दोनों ने साथ मिलकर रंग खेला।
उस दिन आरव को समझ आया कि असली होलिका दहन लकड़ियों को जलाने से नहीं, बल्कि मन की बुराइयों को जलाने से होता है।
आज के युग में होलिका दहन हमें याद दिलाता है कि तकनीक, सोशल मीडिया और भौतिक दौड़ के बीच हमें अपने संस्कार और रिश्ते नहीं भूलने चाहिए।
होलिका दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। हमें अपने अंदर की नकारात्मकता, अहंकार और ईर्ष्या को जलाकर प्रेम, सच्चाई और सद्भाव को अपनाना चाहिए। यही सच्ची विजय है — अच्छाई की बुराई पर।
* राम कुमार दीक्षित पत्रकार
