कल रात एक अजीब-सा सपना मेरी आँखों में उतर आया। मैंने देखा कि मैं अपने परिवार के साथ हिमालय की गोद में बसे खूबसूरत शहर शिमला की सैर पर गया हूँ। ठंडी हवाएँ, देवदार के पेड़ों की खुशबू और ढलते सूरज की सुनहरी किरणें—सब कुछ मन को मोह रहा था। हम “सनसेट पॉइंट” की ओर बढ़ ही रहे थे कि अचानक हमारी कार के ब्रेक ने जवाब दे दिया। चीख, अफरा-तफरी और फिर गहरी खाई… लगभग पंद्रह सौ फीट नीचे गिरते ही सब कुछ समाप्त। मुझे लगा जैसे मेरा शरीर वहीं छूट गया और मैं किसी अनजानी रोशनी की ओर बढ़ चला हूँ। अगले ही क्षण मैं स्वर्गलोक में खड़ा था। सामने देवराज इंद्र मुस्कुराते हुए दिखाई दिए। उनके पास खड़े दिव्य तेज वाले यमराज मुझे वहाँ तक लेकर आए थे। मेरे हाथ में एक भारी बैग था। इंद्र ने पूछा—“इसमें क्या है?” मैंने गर्व से कहा—“मेरी पूरी जिंदगी की कमाई, पूरे पाँच करोड़ रुपये।” उन्होंने शांत स्वर में एक लॉकर की ओर संकेत किया—“इसे वहाँ रख दीजिए।” मैं प्रसन्न था कि मेरी दौलत यहाँ भी सुरक्षित है। थोड़ी देर बाद मैं स्वर्ग के भव्य बाज़ार में पहुँचा। वहाँ अद्भुत वस्तुएँ थीं—शांति, आनंद, दिव्य प्रकाश, अमृत समान अनुभव। मैंने कुछ सुख चुनकर काउंटर पर अपने हजार-हजार के नोट बढ़ाए। प्रबंधक ने मुस्कराकर कहा—“क्षमा कीजिए, यहाँ यह मुद्रा नहीं चलती।” मैं हतप्रभ रह गया। शिकायत लेकर इंद्र के पास पहुँचा तो वे बोले—“व्यापारी होकर भी इतना नहीं समझे? यह धरती की मुद्रा है, यहाँ केवल कर्म की करेंसी चलती है।” मेरी आँखें फटी रह गईं। मैंने पूछा—“फिर यहाँ किसका धन मान्य है?” इंद्र ने कहा—“जिसने धरती पर किसी दुखी को सहारा दिया, किसी भूखे को भोजन कराया, किसी अनाथ को शिक्षा दी, किसी रोते को हँसाया—उसे यहाँ ‘पुण्य-क्रेडिट कार्ड’ मिलता है। उसी से स्वर्गीय सुख खरीदे जाते हैं।” मेरे हाथ काँपने लगे। मुझे अपना जीवन याद आया—दिन-रात भागदौड़, सिर्फ पैसा… माता-पिता की सेवा टाली, बच्चों के संग समय नहीं बिताया, पत्नी की सेहत अनदेखी की, रिश्तों को बोझ समझा। मैंने रोते हुए कहा—“हे देवराज, मुझे यह नियम क्यों नहीं पता था? मैंने तो जीवन भर बस नोट गिने।” इंद्र की आवाज गूँजी—“धरती पर हर आत्मा को यह ज्ञान दिया जाता है, पर वह सुनना नहीं चाहती।” मैं फूट-फूटकर रो पड़ा। तभी मुझे कुछ नाम सुनाई दिए—धरती के बड़े उद्योगपतियों के, जिनकी अरबों की संपत्ति यहाँ केवल स्मृति बनकर रह गई थी। मुझे समझ आ गया कि धन की सीमा है, पर कर्म की नहीं। मैं गिड़गिड़ाया—“एक अवसर और दे दीजिए, मैं लौटकर सच्ची दौलत कमाऊँगा।” तभी किसी ने कहा—“तथास्तु।” मेरी आँख खुली तो सुबह की किरणें कमरे में बिखर रही थीं। मैं जीवित था। मेरा परिवार सुरक्षित था। पर भीतर कुछ बदल चुका था। अब मुझे समझ आया कि असली समृद्धि बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उन दिलों में है जहाँ हमारे कारण मुस्कान जन्म लेती है। उस दिन से मैंने ठान लिया—ऐसी संपत्ति अर्जित करूँगा जो मृत्यु की सीमा भी पार कर जाए, क्योंकि स्वर्ग में वही करेंसी चलती है जो मानवता से कमाई जाती है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
