एक संयुक्त परिवार में सुमित्रा देवी अपनी बहू राधा के साथ रहती थीं। राधा पढ़ी-लिखी और समझदार थी, लेकिन उसका एक स्वभाव पूरे घर को परेशान करता था— छोटी-छोटी बातों पर क्रोध।
कभी काम में देर हो जाए, कभी किसी की बात पसंद न आए, तो उसके मुँह से तीखे शब्द निकल ही जाते।
सुमित्रा देवी बहुत सहनशील थीं। वे जानती थीं कि बहू का दिल बुरा नहीं है, बस गुस्सा उस पर हावी हो जाता है। एक दिन उन्होंने राधा को पास बैठाया और प्यार से कहा— “बहू, आज से मैं तुम्हें एक थैला दे रही हूँ। इसमें कुछ कीलें हैं।
जब भी तुम्हें मुझ पर, घर पर या किसी बात पर बहुत क्रोध आए, तो घर के पिछवाड़े लकड़ी के बाड़े में एक कील ठोंक देना।”
राधा को यह अजीब लगा, पर उसने सास की बात मान ली।
अगले दिन ही उसे कई बार गुस्सा आया—
एक कील… फिर दूसरी… फिर तीसरी।
कुछ ही दिनों में बाड़े की दीवार कीलों से भर गई।
धीरे-धीरे राधा को एहसास होने लगा कि कील ठोंकना कितना कठिन और व्यर्थ काम है, और इससे अच्छा तो क्रोध को वहीं रोक लेना है।
अब जब भी गुस्सा आता, वह खुद से कहती—
“क्या मुझे फिर एक कील ठोंकनी है?”
दिन बीतते गए…
कीलों की संख्या कम होती गई…
एक दिन ऐसा भी आया जब पूरे दिन एक भी कील नहीं ठोंकी गई।
राधा खुशी-खुशी सुमित्रा देवी के पास पहुँची।
सास मुस्कुराईं और बोलीं—“बहू, अब जिस दिन तुम्हें लगे कि तुमने पूरे दिन क्रोध पर नियंत्रण रखा है, उस दिन बाड़े से एक कील निकाल लेना।”
राधा ऐसा ही करने लगी।
समय के साथ एक-एक कर सारी कीलें निकल गईं।
एक दिन राधा दौड़ती हुई आई—
“माँजी! अब बाड़े में एक भी कील नहीं बची।”
सुमित्रा देवी उसे बाड़े में ले गईं।
दीवार पर कीलों के गहरे छेद दिखाते हुए बोलीं— “बहू, क्या तुम इन छेदों को भर सकती हो?”
राधा की आँखें भर आईं।
वह बोली— “नहीं माँजी…”
सुमित्रा देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा—
> “बस यही बात समझाना चाहती थी।
क्रोध में बोले गए कठोर शब्द, रिश्तों के दिल में ऐसे ही छेद कर देते हैं,
जिन्हें माफी से भी पूरी तरह भरा नहीं जा सकता।
इसलिए गुस्सा आने से पहले सोच लेना—
कहीं तुम किसी अपने के दिल में कील तो नहीं ठोंक रही हो।”
उस दिन के बाद राधा बदली-बदली सी थी।
घर का वातावरण हल्का, प्रेमपूर्ण और शांत हो गया।
जब भी क्रोध आए, एक पल ठहरिए…
क्योंकि शब्दों से लगी चोट
समय के साथ भी निशान छोड़ जाती है।
- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
