राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर यह कहानी उस दीये की है जो आँधियों के बीच भी जलना जानता था—एक छोटे से गाँव में जन्मी दीया, जिसके घर में बेटियों को बोझ समझा जाता था, पर उसकी माँ की आँखों में सपने थे और पिता के मन में भय।
दीया स्कूल जाती तो थी, पर रोज़ यह सुनकर कि “लड़की होकर क्या करोगी?”, फिर भी वह किताबों से दोस्ती करती रही, मिट्टी के आँगन में गणित के सवाल बनाती, और रात को छत पर बैठकर तारों से अपने भविष्य की बातें करती।
गाँव में जब लड़कियों की पढ़ाई छुड़ाकर उन्हें काम में लगा दिया जाता, दीया चुपचाप अपने दोस्तों को पढ़ाना शुरू कर देती—कभी पेड़ की छाँव में, कभी कुएँ के पास—उसकी मेहनत रंग लाई जब एक प्रतियोगिता में उसने जिला स्तर पर पहला स्थान पाया; पुरस्कार लेने शहर गई तो पहली बार उसने देखा कि दुनिया बड़ी है और सपनों के लिए जगह भी।
लौटकर उसने पिता से कहा कि वह पढ़ेगी और कुछ बनेगी, पिता ने पहली बार उसकी आँखों में आत्मविश्वास देखा और चुपचाप हामी भर दी।
वर्षों बाद दीया उसी गाँव की पहली इंजीनियर बनी, पर उसकी सबसे बड़ी जीत अपनी डिग्री नहीं, बल्कि वह स्कूल था जो उसने गाँव में खुलवाया—जहाँ आज हर बेटी बेखौफ होकर सपने देखती है;
यह कहानी सिखाती है कि बेटी कोई बोझ नहीं, वह संभावना है—उसे अवसर, विश्वास और शिक्षा मिले तो वह न केवल अपना भविष्य रोशन करती है, बल्कि पूरे समाज का रास्ता उजाला कर देती है।
——– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

