यह कहानी है दो अटूट दोस्तों, आर्यन और कबीर की। बचपन की गलियों से लेकर कॉलेज के गलियारों तक, उनकी दोस्ती की मिसाल पूरे शहर में दी जाती थी। लोग कहते थे कि “आर्यन और कबीर एक जान और दो शरीर हैं।” लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, एक खूबसूरत रिश्ते को किसी की नजर लग ही जाती है।
कॉलेज के आखिरी साल में उनकी जिंदगी में माया नाम की एक लड़की आई। माया बेहद चतुर और जोड़-तोड़ करने वाली थी। उसे इन दोनों की गहरी दोस्ती से जलन होने लगी। उसने धीरे-धीरे आर्यन और कबीर के बीच गलतफहमियां पैदा करना शुरू कर दिया।
माया आर्यन से कहती, “कबीर तुम्हारी पीठ पीछे तुम्हारी काबिलियत का मजाक उड़ाता है,” और कबीर से कहती, “आर्यन को लगता है कि तुम उसके बिना कुछ भी नहीं हो।” देखते ही देखते, सालों का भरोसा चंद हफ्तों में डगमगाने लगा। बातों का सिलसिला बंद हो गया और एक दिन एक छोटी सी बहस ने इतना बड़ा रूप ले लिया कि दोनों ने एक-दूसरे का चेहरा न देखने की कसम खा ली।
दो साल बीत गए। दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में आगे तो बढ़ गए थे, लेकिन दिल के किसी कोने में आज भी एक खालीपन था। माया का असली चेहरा भी अब सबके सामने आ चुका था, लेकिन आर्यन और कबीर का अहंकार उन्हें एक-दूसरे से बात करने से रोक रहा था।
कहते हैं जब इंसान थक जाता है, तो ईश्वर हस्तक्षेप करते हैं। एक शाम, पहाड़ी पर स्थित एक प्राचीन मंदिर के वार्षिक उत्सव में दोनों अनजाने में पहुँच गए। भारी भीड़ थी और अचानक मूसलाधार बारिश होने लगी।
भीड़ की भगदड़ में आर्यन का पैर फिसला और वह गहरी ढलान की ओर गिरने लगा। तभी एक मजबूत हाथ ने उसे थाम लिया। वह हाथ कबीर का था। कबीर ने अपनी जान जोखिम में डालकर आर्यन को ऊपर खींचा। दोनों की सांसें फूल रही थीं और आंखों में आंसू थे।
मंदिर की घंटियों की गूंज के बीच, दोनों को अहसास हुआ कि माया की कड़वाहट उस प्यार के सामने कुछ भी नहीं थी जो उन्होंने बचपन से साझा किया था। उस दिव्य वातावरण में सारा अहंकार बह गया।
आर्यन ने कबीर को गले लगा लिया और कहा, “मुझे माफ कर दे यार, मैं एक बाहरी इंसान की बातों में आ गया।” कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा, “शायद भगवान को यही मंजूर था कि हम आज यहाँ मिलें और अपनी दोस्ती को नया जीवन दें।”
उस दिन के बाद उनकी दोस्ती पहले से भी अधिक मजबूत हो गई। उन्होंने सीखा कि सच्ची दोस्ती ईश्वरीय आशीर्वाद है, जिसे किसी तीसरे के बहकावे में आकर कभी कमजोर नहीं होने देना चाहिए।
——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

