जालोर, राजस्थान परम् सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने सतसंग में कहा कि समरथ गुरु का हाथ अगर पकड़ लिया जाए तो वे यहां इस धरती पर भी मदद करते हैं, मरते समय भी मदद करते हैं और मरने के बाद भी मदद करते हैं। समरथ गुरु मिल जाने पर अगर उनकी दया हम लेते रहें, गुरु भक्ति करते रहें तो किसी भी लोक में कोई भी डर नहीं रहता है।इसीलिए कहा गया,
“गुरु को सिर पर राखिये, चलिये आज्ञा माहीं।
कहैं कबीर ता दास का, तीन लोक भय नाहीं।।”
गुरु कितने तरह के होते हैं और समरथ गुरु कौन होते हैं?
कहा गया,
“प्रथम गुरु पिता और माता, जो हैं रक्त बीज के दाता।
दूसर गुरु भई वह दाई, जो गर्भवास की मैल छुड़ाई।
तीसर गुरु ने नाम उचारा, गांव देश के लोग पुकारा।
चौथा गुरु ने शिक्षा दीन्हा, तब संसारी वस्तु चीन्हा।
पांचवां गुरु ने दीक्षा दीन्हा, राम कृष्ण का सुमिरन कीन्हा।
छठवां गुरु ने सब भ्रम तोड़ा, ओंकार से नाता जोड़ा।
सतवां गुरु सत शब्द लखावा, जहां का जीव तहां पहुंचावा।”
गुरु तो बहुत तरह के होते हैं। गुरु गुरु में भी भेद होता है लेकिन जो शब्द भेदी होते हैं, जो शब्द का भेद बताते हैं, जो सुरत (जीवात्मा) को शब्द (प्रभु की आवाज) के साथ जोड़ते हैं, वे समरथ गुरु होते हैं और वे जब शब्द का भेद बताते हैं तब यह जीवात्मा परमात्मा तक पहुंच पाती है।
जब परमात्मा मिल जाते हैं तब दुनिया की चीजें तो बिना मांगे ही मिल जाती हैं
जब परमात्मा मिल जाते हैं तब फिर कोई भी चीज की कमी नहीं रह जाती है। फिर दुनिया की चीजें तो बिना मांगे ही मिल जाती हैं। इच्छा करने पर ही मिल जाती हैं। इच्छा करने पर ही सती सावित्री ने अपने पति के प्राणों को वापस ले लिया था। इच्छा करने से ही सती अनसुईया ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को छोटा-छोटा बच्चा बना दिया था। इच्छा करने पर ही हनुमान जी जब संजीवनी लाने गए तब कभी छोटा बन गए और कभी भारी-भरकम शरीर बना लिया।
