शहर की चमक में खोया सुरेश, अमीर बाप का बेटा, सिर्फ ऐशो–आराम और पैसे उड़ाने में लगा था। उसे लगता था कि जिंदगी का मज़ा बस खर्च करने में है। मगर एक रात उसकी राह बदल गई—जब उसने सड़क किनारे बैठी अनन्या को देखा, जो गरीब बच्चों को पढ़ा रही थी।
उनकी आँखों में उम्मीद थी… और अनन्या की आवाज़ में जज़्बा।
सुरेश ने पूछा—
“इससे क्या बदल जाएगा?”
अनन्या मुस्कुराई—
“सब नहीं… लेकिन किसी एक बच्चे का भविष्य जरूर बदल जाएगा।
और याद रखना—परिवर्तन पैसे से नहीं, दिल से होता है।”
यह बात सुरेश के भीतर गूंज गई।
उसी रात पहली बार उसने खुद से सवाल किया—
“मैं अपनी ज़िंदगी के साथ कर क्या रहा हूँ?”
धीरे-धीरे वह वहाँ रोज़ जाने लगा। बच्चों को पढ़ाने में मदद करने लगा।
और महीनों में सुरेश बदल गया—
पार्टी, शौक, फिजूलखर्ची सब छोड़ दी।
अब उसका पैसा बच्चों की किताबों में लगने लगा,
उसका समय उनकी मुस्कानों में,
और उसकी ऊर्जा—एक नई शुरुआत में।
आख़िरकार उसने शुरू की—
“उम्मीद की किरण” —एक संस्था, जो हजारों बच्चों की शिक्षा का सहारा बनी।
उसने सीखा कि
असली अमीरी वो है, जो किसी और की ज़िंदगी रोशन कर दे।
और अक्सर…
हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव
किसी एक अच्छे इंसान से मिलने के बाद आता है।
——– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
