मगर कैसे बच सकता था
जो बचेगा
कैसे रचेगा
पहले मैं झुलसा
फिर धधका
चिटखने लगा
कराह सकता था
मगर कैसे कराह सकता था
जो कराहेगा
कैसे निबाहेगा
न यह शहादत थी
न यह उत्सर्ग था
न यह आत्मापीडन था
न यह सज़ा थी तब
क्या था यह
किसी के मत्थे मढ़ सकता था
मगर कैसे मढ़ सकता था
जो मढ़ेगा कैसे गढ़ेगा !!
——– श्रीकांत वर्मा
( संकलित )
——— राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

